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विद्रूपताओं का आईना

कविता

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सवाल दर सवाल!

मुद्दा ये नहीं है कि तस्वीर दिखलाई किसनेआख़िर सूरत वतन की ऐसी बनाई किसने? जायज़ नहीं है कहना कितनों को…

जहाँगीर का घंटा !

तेरे हक़ मेंकुछबेहद मामूलीऔरमेरे हक़ मेंहर बड़ा फ़ैसला आना हैजबइंसाफ़ खुदसत्ता की तान परडोल रहा हैतोकिस कमबख़्त कोउसकाघंटा बजाना है।…

जान रहा हूँ

हक़ीक़त है क्या फ़सानामैं सब जान रहा हूँसाधो जग का यूँ बौरानामैं सब जान रहा हूँ। सैफ़ ज़ुबाँ से बरगलानामालूम…

अनूठी क्रांति!

कौन कहता है इंसान कोलट्टू की तरह नचाया नहीं जा सकताखुद नाचना चाहो तोनाच सकते होबेशक नाचोनफ़रत की बीन परलेकिनराम…