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विद्रूपताओं का आईना

भगवान और भिखारी!

Byआज़ाद

Jun 14, 2020

भगवान नाम था उसका। आसमान वाला नहीं धरती का यानी सिर्फ़ नाम का भगवान। अब अगर किसी का नाम ही भगवान रख दिया गया हो तो कोई उसे शैतान कैसे कह सकता है। वैसे वो काम वाला भी होता तो क्या कर लेता उनका जो हमारी तरह खुद अपने हाथ हवन में जला चुके हों। लेकिन गाँव के भोले भाले भगवान दास को उसके चेहरे पर अपने भविष्य का उजाला दिखा और चेहरे के पीछे अच्छे दिनों का प्रकाश पुंज। ये कहानी भगवान और भगवान दास के बीच अपने अपने स्वार्थों से उपजे अटूट संबंध की एक दैवीय कथा है।

दरअसल भगवान दास को भगवान के भीतर छिपे आधुनिक गुणों का भान और उनके चमत्कारी रूप का अहसास तब हुआ जब गाँव के हालात और प्रधान से असंतुष्ट होकर उसने सात नदी पार बाहर गाँव जाने का फ़ैसला किया। दुविधाओं का जंगल पार कर जब वो विकल्प के मैदान में पहुँचा तो अचानक भगवान से हुई मुलाकात के बाद उसके सामने सब कुछ साफ़ था। भगवान दास तय कर चुका था कि वो अब गाँव नहीं छोड़ेगा क्योंकि उसके समस्त दुःखों को हरने के लिये साक्षात भगवान सामने थे।

दास से मैदान में टकराये संन्यासी वेश धारी भगवान ने उसे ये गुरुमंत्र दे कर अपना शिष्य बना लिया कि हमेशा खुद के विपक्ष में रहो और विरोधियों को बोलने का मौका मत दो। ये गाँव जो आज तुम्हें नर्क सा प्रतीत हो रहा है वो ही तुम्हारे लिये स्वर्ग में तबदील हो जाएगा। भगवान ने ये भी कहा कि उनके जैसा होने के लिये खून में व्यापार का होना ज़रूरी है। इसलिये भगवान दास चाहे तो उस के खून की कुछ बूँदे लेकर अपना डीएनए बदल सकता है। लेकिन भगवान ने ये भी साफ़ कर दिया कि इसकी उसे भारी क़ीमत चुकानी होगी।

भगवान दास को बदले में यही करना था कि उसे अपने भगवान को पूरे गाँव का भगवान बनाना था। भगवान ने दास से कहा कि अगर उसने साथ दिया तो वो गाँव में प्रधान की गद्दी में बैठ कर केवल उसकी सेवा करेगा। दास को पहले ही मौजूदा प्रधान से नाराज़ हो कर गाँव छोड़ने का फ़ैसला कर चुका था। ऐसे में उसे भगवान की ये पेशकश सुन कर खुशी में ये समझ नहीं आ रहा था कि वो कौन सी कहावत यहाँ फिट करे, अंधे को दो आँखें मिलना या अक़ल का अंधा हो जाना। बहरहाल भगवान के डीएनए से अपनी मैचिंग कराने के बाद उसे ये सौदा पसंद आया और उसने हामी भर दी।

भगवान के निर्देशों पर अमल करते हुए दास ने उन्हें गाँव के मंदिर के पास अपनी ज़मीन पर कुटिया बनाने की अनुमति दे दी और गाँव भर में फैला दिया कि उनके दुःखों को मिटाने के लिये हिमालय में तपस्या कर चुके एक संन्यासी पधारे हैं। गाँव भर के कई असंतुष्ट प्रधान के विरुद्ध मोर्चा लेकर दास से मिले और उन्हें भगवान से मिलाने और तरह तरह की भेंट देने का अनुरोध किया। गर्व से फूले दास ने उन्हें मुलाक़ात का भरोसा दिलाया और फिर सारी कथा भगवान को कह सुनाई।

भगवान ने निर्विकार भाव से दास से कहा कि उन्हें एक फ़क़ीर की तरह रहने का शौक़ है और वो किसी से भी मुलाक़ात में कोई भेंट नहीं लेंगे। लेकिन अगर दास और उनके समर्थक अपने अपने घर से दूध की एक कटोरी मलाई और बाकी मलाई से बना सारा घी उनकी बतायी जगह पर ही दान करें तो उन्हें तृप्ति मिल जाएगी। दास ने पूछा कि हे भगवान क्या आप कुछ नहीं खाएंगे तो जवाब मिला कि न मैं मलाई खाऊँगा और न गाँव वालों को खाने दूँगा। फ़क़ीर की इस अदा पर दास पूरा लोट गया।

भगवान ने अपने दास और समर्थकों को समझाया कि उन्हें सालों से अटकी कृपा को पाने के लिये एक एक कटोरी मलाई का उनकी कुटिया के क़रीब बने मंदिर के भगवान को रोज सुबह भोग लगाना होगा। बाकी मलाई से जो भी घी निकलेगा वो मंदिर के बाहर पसरे हुए ग़रीब भिखारी को दान करना होगा। ये दान पूरी तरह से गुप्त होगा जिसमें दान देने वाला और लेने वाला अपने चेहरे को कपड़े से ढक लेगा ताकि दान की गोपनीयता भंग न हो और आपस में दोस्ताना भी बना रहे।

गुप्तदान करते हुए कई दिन बीत गये। दास ये देख कर चमत्कृत था कि एक दाना भी पेट में न डालने के बावजूद भगवान की सेहत रोज आम चूसने वाले बनिये की तरह लाल हो रही थी। उसे पक्का यक़ीन हो चला था कि बिना कुछ खाये पिये इस तरह सेहतमंद तो भगवान ही रह सकता है। भगवान के इसी दैवीय रूप ने उसे गाँव का प्रधान बना दिया था। लिहाज़ा दास को भी सेवा का फल मिल रहा था उनके आशीर्वाद के रूप में। उधर मंदिर के सामने पड़ा भिखारी भी गाँव भर के दान का घी पी पी कर मुटिया रहा था।

एक दिन भगवान दास जब एक कटोरी मलाई के साथ मंदिर के भगवान को भोग चढ़ाने पहुँचा तो देखा कि भगवान वहाँ खुद अवतरित होकर अपना भोग चख रहे हैं। अरे मूर्ति वाले नहीं, खुद दास के वो भगवान जिन्हें कुछ समय पहले वो कुटिया में तपस्या करते छोड़ कर आया था। भगवान को गाँव भर की मलाई चट करते देख दास को अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हुआ। वो छिप कर पूरे भक्ति भाव से अपने भगवान पर नज़र रखने लगा।

दास ने देखा कि भगवान ने मंदिर में लगी भगवान की मूर्ति को बाएँ से दाएँ मरोड़ा और चबूतरे में सुरंग का रास्ता खोल कर उसमें समा गये। भगवान दास समझ चुका था कि उसके भगवान अपनी कुटिया से इसी सुरंग के ज़रिये रोज मंदिर आते हैं और मूर्ति वाले भगवान का भोग चट कर जाते हैं। दास अपने भगवान के चोरी समान इस कृत्य को भी उनका कोई चमत्कार समझ मन ही मन में बुदबुदाया कि हे भगवा (सॉरी अगेन टाइपिंग म्स्टेक) भगवान तू है तो सब मुमकिन है। ये बात और है कि वो अपने समर्थकों के साथ इस चमत्कारी रहस्योद्घाटन को साझा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उसे पता था कि अगर बात उल्टी पड़ी तो लोग उसकी अक़ल को ही दोष देंगे तो इससे तो चुप ही भली।

भगवान दास को जो पता चला वो उसके लिये मजबूरी में ही सही लेकिन भगवान का चमत्कार था। लेकिन और भी ऐसा बहुत कुछ था जो अब भी उसे पता नहीं था। ये बात सिर्फ़ मंदिर का वो भगवान ही जानता था जिसकी मूर्ति संविधान की तरह अपनी जीवंत आँखों से सब कुछ देखती रहती थी। उसे तो न जाने कब से पता था कि दास का ये भगवान उसके भीतर बनी सुरंगों के ज़रिये न सिर्फ़ सब मलाई चाट रहा था बल्कि भिखारी का वेश बदल कर वही सारे गाँव का घी भी पी रहा था। ये बात और थी कि वो ये बात बोल नहीं सकता था। कम से कम उनसे तो नहीं जो इसी बात पर सालों से उलझे पड़े हैं कि गंगाधर ही शक्तिमान है या आपदा ही अवसर। जो है सो तो है ही।

@भूपेश पन्त

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