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विद्रूपताओं का आईना

नव गणतंत्र के सबक!

Byआज़ाद

Jan 26, 2021

किसी गणतांत्रिक देश की राजनीति, आर्थिकी, समाज, तकनीक, न्याय और व्यवस्था में किसी भी तरह का बदलाव सरकारी तारीख़, समय और इजाज़त का मोहताज होता है।

देश के इतिहास में दर्ज़ सारे बदलाव, जिन्हें कुछ लोग स्वाधीनता आंदोलन या क्रांति कहते रहे हैं, ग़ैर क़ानूनी थे क्योंकि वो जिनके विरोध में थे, उनसे उनकी इज़ाज़त नहीं ली गयी थी।

देश की तरक्क़ी पर बदनुमा दाग़ लगाने वाले ग़रीबों की सब्सिडी ख़त्म करने वाली सरकार उनके ही वोटों के दम पर खुद को जनता का प्रतिनिधि बताते हुए सब्सिडी के तौर पर मनमाने फ़ैसले ले सकती है।

सच्चे लोकतंत्र में मतदाताओं को पाँच साल में एक ही बार अपने मन की बात करने का हक़ होता है। इसके बाद वो अगले पाँच साल तक सरकार को मन की बात सुनाने का ठेका दे चुका होता है।

महिलाओं को किसी भी तरह के आंदोलन, संघर्ष और बदलाव से दूर रख कर हम महिला सुरक्षा को बेहतर बना सकते हैं जिससे अंतत: सरकार का नारी सशक्तिकरण का मक़सद पूरा होता है।

इतिहास बताता है कि बुज़ुर्गों और बच्चों को आंदोलनों में शामिल होने का मौका देकर ब्रिटिश हुकूमत ने धोखे ही खाये। ये पाबंदियां होतीं तो न गांधी जी और दूसरे नेता आज़ादी की इबारत लिख पाते और न भगतसिंह खेत में बंदूक उगाते।

लोकतांत्रिक प्रणाली में रहने वालों के बीच किसी भी तरह का टकराव रोकने के लिये उनका एक होना बेहद ज़रूरी है। ये एकता उन्हें एक डंडे, एक झंडे, एक रंग, एक ढंग, एक विश्वास और एक विचार को अपना कर ही हासिल हो सकती है। बशर्ते वो इस एकता के लिये पहले शारीरिक और मानसिक तौर पर कई खांचों में बंटने के लिये तैयार हों।

गणतांत्रिक होने के बावजूद ये कतई ज़रूरी नहीं कि देश की अधिकांश जनता के लिये जो अन्नदाता हों वो सरकार या उनके समर्थकों के भी अन्नदाता हों।

देश की आज़ादी और लोकतंत्र का ये मतलब रहा है कि अंग्रेजों की तरह कोई भी कंपनी आगे जाकर अपनी सरकार न बना सके। लेकिन इसका ये अर्थ नहीं कि आगे कोई सरकार कंपनी बहादुर की तरह नहीं चल सकती है।

नव लोकतंत्र में देशभक्ति के नाम पर सरकार के अलावा कोई भी देश के भविष्य को ताक पर नहीं रख सकता। हज़ारों शौचालय बनवा कर कोई भी सरकार दावा कर सकती है कि आपका भविष्य पहले ही आपके हाथ में सौंपा जा चुका है।

अगर आपको सत्ता के लिये कुत्ते पालने का शौक़ है और आप उनसे डरते भी हैं तो ये लोकतंत्र मीडिया हाउस खोलने का हक़ और कुत्तों की नकेल दोनों आपके एक ही हाथ में दे सकता है।

नव गणतंत्रवादी सरकार देश की सीमाओं की बात करके देशवासियों के गणतांत्रिक अधिकारों की सीमा तय कर सकती है। और जहाँ तक वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा का प्रश्न है तो ये सत्ता की दुनिया में कुटुम्ब की धारणा को ही बल प्रदान करती है।

नागरिक का अर्थ है नगर में रहने वाला। लोकतंत्र में सभी नागरिकों को समान अधिकार दिलाने के लिये ग्रामीणों को नगरवासी बनाना आवश्यक है। इसके लिये गाँव के बहुसंख्यक किसानों, मज़दूरों और देहातियों को उनके पास मौजूद ज़मीन से बेदख़ल कर नगर या महानगर के पीएम आवास तक पहुँचाना लोकतंत्र का पवित्र और अंतिम ज़रूरी संस्कार है।

अंतत: ये साबित हुआ है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के किसी भी फ़ैसले के ख़िलाफ़ आंदोलन करने के लिये सरकार से अनुमति लेना और ले पाना ही सच्चा लोकतंत्र है।

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